Tuesday, May 13, 2008

मन !!



ना मिली हो तुम मगर , उम्मीद पे जीता है मन !
टूट कर बिखरे सितारे , असमाँ सिता है मन !!

न हो तुम फिर भी तुम्हारे , होने का अहसास है !
पर रहोगी साथ एक दिन , ये मेरा आभास है !!
तुम रहोगी सोच कर , अब तलक रीता है मन !
ना मिली हो तुम मगर , उम्मीद पे जीता है मन !

तुम मेरी सच्चाई हो या , तुम हो मेरी कल्पना !
ख्वाब का सच या कोई , सच भरा सपना बुना !!
सोच रातों करवटें ले , आँखों मे बीता है मन !
ना मिली हो तुम मगर , उम्मीद पे जीता है मन !

आयेगी वो शाम भी जब , मेरे आंगन आओगी !
ख्वाब मे देखे मेरे , अरमान सच कर जाओगी !!
पोछोगी ये अश्क जो , चुपचाप ही पीता है मन !!
ना मिली हो तुम मगर , उम्मीद पे जीता है मन !

1 comment:

Unknown said...

bahut hi sunder kavita hai
bhavnao ko kafi achchhi tara se vyakt kiya hai