Thursday, January 29, 2009

मन सरीता !!




अंश अपने मन का कर तुझको को समर्पित !
लिख रहा तेरे लिए मन की सरीता !!

है बहुत लिखना मगर शब्द कम है !
भावना के बोल और मन की कलम है !!
अपने मन मे जो तेरी मूरत बसाई !
वो नही मिटती किसी से भी मिटाई !!
तुम ही मेरे मन की हो पहली करीता !

जब अकेला था जीवन डगर मे !
मित्र बन चलदी संग तुम सफर मे !!
क्या हूँ मै मुझको तुमने बताया !
और जब भटका कही तुमने बचाया !!
जान पाया तुमसे ही क्या है वनीता !

जो मिला तुमसे तेरा उपकार समझूँ !
जो मिले तुमसे तुम्हारा प्यार समझूँ !!
चाँहू सब लौटाना इस जीवन सफर मे !
हाथ तेरा थाँमू हर मुश्किल डगर मे !!
है दुआ तुम रहो हर दम सस्मिता !

लिख रहा तेरे लिए मन की सरीता !!