Sunday, October 4, 2009

बाबूजी



जीवन पथ पर प्रथम चरण तुमने ही चलाया बाबूजी !
क ख ग का पहला अक्षर तुमने सिखाया बाबूजी !!

कौन सही और कौन ग़लत मुझको ये भी भान न था !
भले बुरे का भेद जगत मे तुमने बताया बाबूजी !!

बालकपन मे जब हम भटके मार्ग दिखाया बनके पिता !
और जवानी मित्र बनाकर गले लगाया बाबूजी !!

अपने बच्चों की खातिर तुमने हर पल त्याग किया !
पितृ धर्म को पूर्ण रूप मे तुमने निभाया बाबूजी !!

जीवन के इन संघर्षो मे जब भी लगा की तनहाँ हूँ !
सांथ हो तुम ये हाथ पकड़ कर मुझे जताया बाबूजी !!

जब भी टूटने लगा हौसला और ये मन कमजोर हुआ !
तेरी कविता पड़कर साहस पुनः जगाया बाबूजी !!

रहूँ दूर मे तुझसे से माँ से पर मन आंगन बसता है !
देखूँ तुम्हे जब जब घर आऊँ मन मुस्काया बाबूजी !!