
कुछ पल मे पहुँचो जब पूरब मेरे घर !!
तो पूछेगी माँ है मेरा लाल कैसा , छुकर के पैरों को उंनसे ये कहना !
महसूस करता वही हाथ सिर पे , जो जाते हुए रोते उसने रखा था !
अभी तक जुबान पे वही स्वाद गुड़ का , हाथोँ से जो आखरी चखा था !
कहना बहुत याद करता हूँ उसको !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !
पिताजी मिलेगें वही चाय पीते , कुछ पल उनके संग बैठ लेना !
महसूस करना छुपी मन मे हलचल , है चिंता मेरी पर जताते नही है !
भरती है आंखे मुझे याद कर के , मगर बोलकर वो बताते नही है !
कहना हूँ अच्छा करें ना यूं चिंता !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !
मिलेगा बिस्तर मै उन्नीदा भाई , उठा के कहना की दिन चढ़ चला है !
आंगन मे गीले कपड़े सुखाती , हँसके मिलेगी भोली सी बहना !
दोनों लड़े ना मेरे ख़त को लेकर , रखे ध्यान सबका उंनसे ये कहना !
कहना की आऊंगा इस बार जल्दी !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !
मिल जाए गर चौक पे यार कोई ,मिलना गले और उससे ये कहना !
मिला ना कभी यहाँ दोस्त तुझसा , है महफ़िल यहाँ पर मजा वो नही है !
अकेला हूँ मै ना कोई संग साँथी , बिना यारों के जिंदगी कट रही है !
कहना की आऊंगा महफ़िल सजाने !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !
आओगे कल तो पुछृँगा तुमसे , कोई घर मिला क्या !
पिताजी है कैसे कहा क्या है माँ ने , उठा था क्या भाई बहाना हँसी क्या !
मिली थी क्या नुक्कड़ पे यारो की महफ़िल , अभी तक है दिल मे यादें बसी क्या !
मिलुंग तुम्हे कल पूरब दिशा मै !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !





