Sunday, January 17, 2010

विवाह



आंगन में खुशियाँ लहरायेँ, हर मन हो उत्साह !
दो तन जब एक मन हो जायें तब हो पूर्ण विवाह !!

बाजे ढोलक ढोल मंजीरे , बन्ना बन्नी शोर !
बंध जायें दो परिवारों में एक प्रेम की डोर !!
थाम के हाथ चले नव पंछी , नव जीवन की राह !

सात वचन मै दू तुमको, ले हम फेरे सात !
साँथ रहें एक मन होकर हम, शीत ग्रीष्म दिन रात !!
प्रेम हो इतना हम दोनों मे ना हो जिसकी थाह !

धन का कोई लेन देन ना मन का हो बस मोल !
रिश्तों मे ना ऊँच नीच हो प्रेम के हों बस बोल !!
मधुर मेल हो परिवारों का सबकी ये हो चाह !

छोड़ पिता का घर आँगन आयी मेरे परिवार !
मै कर्तव्य तुम्हारे बाँटूँ अपने दूँ अधिकार !!
हर खुशियाँ तुम को दे पाऊँ, सुख से हो जीवन निर्वाह !

दो तन जब एक मन हो जायें तब हो पूर्ण विवाह !!

Sunday, October 4, 2009

बाबूजी



जीवन पथ पर प्रथम चरण तुमने ही चलाया बाबूजी !
क ख ग का पहला अक्षर तुमने सिखाया बाबूजी !!

कौन सही और कौन ग़लत मुझको ये भी भान न था !
भले बुरे का भेद जगत मे तुमने बताया बाबूजी !!

बालकपन मे जब हम भटके मार्ग दिखाया बनके पिता !
और जवानी मित्र बनाकर गले लगाया बाबूजी !!

अपने बच्चों की खातिर तुमने हर पल त्याग किया !
पितृ धर्म को पूर्ण रूप मे तुमने निभाया बाबूजी !!

जीवन के इन संघर्षो मे जब भी लगा की तनहाँ हूँ !
सांथ हो तुम ये हाथ पकड़ कर मुझे जताया बाबूजी !!

जब भी टूटने लगा हौसला और ये मन कमजोर हुआ !
तेरी कविता पड़कर साहस पुनः जगाया बाबूजी !!

रहूँ दूर मे तुझसे से माँ से पर मन आंगन बसता है !
देखूँ तुम्हे जब जब घर आऊँ मन मुस्काया बाबूजी !!

Thursday, January 29, 2009

मन सरीता !!




अंश अपने मन का कर तुझको को समर्पित !
लिख रहा तेरे लिए मन की सरीता !!

है बहुत लिखना मगर शब्द कम है !
भावना के बोल और मन की कलम है !!
अपने मन मे जो तेरी मूरत बसाई !
वो नही मिटती किसी से भी मिटाई !!
तुम ही मेरे मन की हो पहली करीता !

जब अकेला था जीवन डगर मे !
मित्र बन चलदी संग तुम सफर मे !!
क्या हूँ मै मुझको तुमने बताया !
और जब भटका कही तुमने बचाया !!
जान पाया तुमसे ही क्या है वनीता !

जो मिला तुमसे तेरा उपकार समझूँ !
जो मिले तुमसे तुम्हारा प्यार समझूँ !!
चाँहू सब लौटाना इस जीवन सफर मे !
हाथ तेरा थाँमू हर मुश्किल डगर मे !!
है दुआ तुम रहो हर दम सस्मिता !

लिख रहा तेरे लिए मन की सरीता !!

Wednesday, December 10, 2008

प्रथम प्रेम !!


मेरी प्रेरणा मेरी कल्पना , मेरा हर्दय श्रंगार तुम !
मेरे प्रेम रूपी पुष्प पे , सावन की पहली फुहार तुम !!

निर्मल तेरा ये रूप है , तू शीत पावन धुप है !
गंगा पवित्र ये मन तेरा , हर बात तेरी अनूप है !
हर मन प्रफुल्लित हो उठे , शब्दों की वो बोछार तुम !!

आँखों से चंचल हिरणी , तू जब चले तो मोरनी !
मुस्कान मे मोती झरे , मेरा दिल चुराया चोरनी !
मेरी प्रेम परिभाषा हो तुम ,मेरा प्रथम इजहार तुम !!

यादों मे मेरी तुम बसी , हर कल्पना मे तुम रची !
सब ख्वाब तुम से जुड़ गए, धड़कन भी मेरी ना बची !
मन मे बसी तेरी मूरती, पूजा मेरी मेरा प्यार तुम !!

मेरी प्रेरणा मेरी कल्पना , मेरा हर्दय श्रंगार तुम !

Wednesday, November 26, 2008

विजय शिखर !!


बहुत सी आस ले ये मन चला पाने शिखर,
मगर दिल मे है जाने कौन सा अंजाना डर !
कही आंधी न आजाये न खा जाऊँ मै ठोकर ,
समय है कम सफर लंबा बचे है कुछ पहर!

बहुत से हाथ मेरे हाथ को थामे हुए है ,
बहुत से लोग मुझ को अपना सा माने हुए है !
कई रिश्तों की जंजीरे मेरे पैरो मे है ,
कई अनजाने मुझ को दोस्त सा जाने हुए है !
मगर फिर भी है सूनापन मन मे कही,
साँथ काफिला पर लगे तनहा सफर !!

कई छोटे बड़े ख्वाब आँखो मे बसते,
कई अरमान मेरे मन मे रोज सजते !
कई उम्मीद के घरोंदे बन गए है ,
न पाई खुशी के सुर कानो मे बजते !
मगर अंजाना सा डर मन मे है ,
न जाने कौन होगा इस सफर मे हमसफ़र !!

है हर बात का अहसास पर जारी सफर,
न चिंता आए कोई भी मुश्किल अगर !
न जाने कौन सी ताकत है ये मन लिए ,
न लगता कोई भी बाधा से इसको डर !
है बस आस की पूरी हो मांगी दुआ जो ,
मिले जो चाहे कुछ पाना विजय शिखर !!

Friday, November 7, 2008

एक तन्हा मन



एक भोला मन प्यारी आँखे जाने किसको ढूंड रही !
देखे सपने जाने किसके जाग जाग के रात कईँ !!

है नादाँ सी कभी कभी , और भोली लगती हर दम है !
पर मन मे तूफान भरा है , पड़ती किसी से ना कम है !
करना है दुनिया को बस मे , सीखना है हर बात नयी !!
देखे सपने जाने किसके जाग जाग के रात कईँ !!

मुस्काता सा चहरा इसका , आंखे झील समाई है !
हे मन से भी सुंदर उतनी , ये परी जमी पे आई है !
शब्द ख़तम हो पर बचजाये , इसकी खूबी कई कई !!
देखे सपने जाने किसके जाग जाग के रात कईँ !!

Monday, September 22, 2008

अब घर जाना है !!



बहुत हुआ अब घर जाना है !
खोये अपने उन सपनों को पाना है !!

छुटे हाथ झलकती आँखे, सिसकी भर भर चलती सांसे !
पोंछने फिर पलक के आंसू, अपने हाथ बड़ाना है !!

छोड़ी गलियाँ वो चौपाले, छत पे मंडली डेरा डाले !
शाम सुनहरी फिर करदे वो, महफ़िल यार सजाना है !!

प्यार से मिलते संगी साँथी, सिर्फ़ प्रेम की भाषा आती !
बोल जो मीठे भूल चुका मै, फिर होंठो पे लाना है !!

वक्त नही अपनों के खातिर, समय चाल समझा ना शातिर !
पास रहे जो बचे हुए पल, अपनों संग बीताना है !!

सब कुछ है पर मन है खाली, बेरंग होली सूनी दीवाली !
अबके दीवाली दीप जलाऊँ, होली रंग उड़ाना है !!

फ़िर अपनों के संग रहूँगा, मन का हर एक दर्द कहूँगा !
मिला नही बरसों से जो, खोया प्यार पाना है !!